संतकबीरनगर में उद्योग बन्धु की बैठकें प्रस्तावों पर चर्चा तक सिमटीं, योजनाओं के क्रियान्वयन पर उठे सवाल
19 अगस्त 2026·सूर्य प्रकाश पाण्डेय·4 मिनट में पढ़ें

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संतकबीरनगर। जनपद में प्रत्येक माह जिलाधिकारी की अध्यक्षता में आयोजित होने वाली जिला उद्योग बन्धु समिति की बैठकें अब उद्योगों की वास्तविक स्थिति और सरकारी योजनाओं के धरातलीय क्रियान्वयन की समीक्षा के बजाय महज प्रस्तावों और समस्याओं पर चर्चा तक सीमित होती दिखाई दे रही हैं। उद्यमियों का आरोप है कि बैठकों में योजनाओं की स्वीकृति और लक्ष्य की समीक्षा तो होती है, लेकिन स्वीकृत परियोजनाओं से वास्तव में कितनी इकाइयां स्थापित हुईं और कितनी वर्तमान में संचालित हैं, इसकी प्रभावी जांच नहीं होती।
सरकार द्वारा उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र और राज्य स्तर पर विभिन्न योजनाओं के माध्यम से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना समेत कई योजनाओं में बैंक ऋण के साथ अनुदान की व्यवस्था है। इन योजनाओं का उद्देश्य युवाओं को स्वरोजगार उपलब्ध कराने के साथ जिले में औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देना है। बावजूद इसके, योजनाओं के वास्तविक लाभार्थियों और स्थापित इकाइयों की स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिकों की सुरक्षा पर सवाल
गोरखपुर हाईवे स्थित औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिकों, विशेषकर महिला कर्मचारियों की सुरक्षा और श्रम नियमों के पालन को लेकर भी शिकायतें सामने आ रही हैं। आरोप है कि कई उद्योगों में श्रमिकों से निर्धारित समय से अधिक काम लिया जाता है। कुछ संस्थानों में रात के समय भी महिला कर्मचारियों को काम के लिए बुलाए जाने की बात कही जा रही है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि महिलाओं से रात्रि पाली में कार्य कराया जाता है तो उनकी सुरक्षा और आवागमन के लिए आवश्यक व्यवस्था होनी चाहिए। औद्योगिक क्षेत्र में काम पर आने-जाने वाली महिला श्रमिकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त पुलिस व्यवस्था नहीं होने का भी आरोप है। स्थानीय लोगों के अनुसार, आने-जाने के समय सड़क किनारे कुछ असामाजिक तत्वों के खड़े रहने से महिलाओं को असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
स्वरोजगार योजनाओं के लाभ पर भी उठे सवाल
मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना समेत अन्य ऋण एवं अनुदान आधारित योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि कागजों में बड़ी संख्या में इकाइयों की स्थापना दिखाई जाती है, लेकिन वास्तविकता में सभी इकाइयां धरातल पर संचालित हैं या नहीं, इसका सत्यापन पर्याप्त रूप से नहीं किया जाता।
कुछ लोगों का दावा है कि बैंक में प्रस्तुत परियोजना रिपोर्टों में रोजगार के लिए दिखाई गई श्रमिकों की संख्या और वास्तविक रूप से कार्यरत श्रमिकों की संख्या में अंतर हो सकता है। यदि पिछले कई वर्षों में स्वीकृत परियोजनाओं में दर्शाए गए रोजगार के आंकड़ों का जमीनी सत्यापन कराया जाए तो वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
एक परिवार से एक लाभार्थी के नियम पर भी सवाल
सरकारी योजनाओं में एक परिवार से एक व्यक्ति को लाभ दिए जाने के प्रावधान को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में एक ही परिवार के दो या तीन सदस्यों को अलग-अलग योजनाओं का लाभ मिलने की बात सामने आई है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित अभिलेखों की जांच के बाद ही हो सकती है।
अनुदान के दुरुपयोग को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कुछ मामलों में मशीनरी खरीद के बिल-वाउचर बैंक में प्रस्तुत कर दिए जाते हैं, जबकि वास्तविक खरीद और इकाई के संचालन की स्थिति संदिग्ध बताई जाती है। यदि ऐसा हुआ है तो यह सरकारी अनुदान के दुरुपयोग का गंभीर मामला हो सकता है और इसकी जांच आवश्यक है।
पांच वर्षों की फाइलों की जांच की मांग
उद्यमियों और शिकायतकर्ताओं की मांग है कि पिछले पांच वर्षों में मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना सहित विभिन्न अनुदान आधारित योजनाओं के तहत स्वीकृत सभी परियोजनाओं का भौतिक सत्यापन कराया जाए। इसमें यह देखा जाए कि स्वीकृत इकाई वास्तव में स्थापित हुई या नहीं, मशीनरी खरीदी गई या नहीं, उत्पादन शुरू हुआ या नहीं, कितने लोगों को वास्तविक रोजगार मिला और अनुदान की राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए किया गया या नहीं।
इसके अलावा बैंक में जमा मशीनरी खरीद के बिल-वाउचर, जीएसटी बिल, भुगतान का विवरण, मशीनरी के भौतिक सत्यापन और इकाई के संचालन से संबंधित अभिलेखों की भी जांच की मांग की जा रही है।
उद्योग बन्धु की बैठकों में वास्तविक समीक्षा की जरूरत
हर महीने होने वाली जिला उद्योग बन्धु समिति की बैठकों में विभिन्न प्रस्तावों, समस्याओं और स्वीकृतियों पर चर्चा होती है। लेकिन सवाल यह है कि स्वीकृत परियोजनाओं में से वास्तव में कितनी इकाइयां स्थापित हुईं और कितनी नियमित रूप से चल रही हैं।
यदि प्रत्येक बैठक में पिछली बैठकों में स्वीकृत योजनाओं की यूनिटवार प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए और बंद अथवा धरातल पर नहीं मिली इकाइयों की सूची सार्वजनिक समीक्षा के लिए रखी जाए तो सरकारी योजनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
फिलहाल आरोपों और शिकायतों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है और यह जांच के बिना सम्भव नहीं है ऐसे में जिला प्रशासन और संबंधित विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उद्योग बन्धु की बैठकों को केवल प्रस्तावों पर चर्चा तक सीमित रखने के बजाय योजनाओं के वास्तविक क्रियान्वयन, श्रमिक सुरक्षा, रोजगार सृजन और सरकारी अनुदान के सही उपयोग की जमीनी समीक्षा का प्रभावी मंच बनाया जाए।